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Wednesday, 11 June 2014

तुम्हारी रोशनी




दिन भर की थकान के बाद
सूरज जब ढलने लगता है
उसकी सुनहरी रश्मियों से टकराकर बनने वाली
तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

छत की मुंडेर पर खड़ी रहकर अनवरत
उस परछार्इं को जाते हर दिन देखती हूं
जो तुम्हारे लौटने के साथ-साथ
मुझसे दूर होती चली जाती है

हर दिन तुम्हें छूकर आने वाली
इन किरणों को आंखों से स्पर्श करती हूं
जैसे तुम्हारे और मेरे दरमियान
स्रेह का अस्तित्व बस इन्हीं से है

मेरी पहुंच से दूर रहकर भी
तुम मुझे रोज छूकर गुजर जाते हो
और तुम्हारी रोशन छवि निहारकर
मेरा मन प्रकाश से भर जाता है

मेरे छज्जे से तुम्हारे छज्जे के कोने तक
ये दूरी जैसे जनम भर की हो 
पर रोज तुम्हारे ओझल होने से पहले
मन की मखमली कैनवास पर
तुम्हारी तस्वीर उतार लेती हूं

ये फासले कब तक रहें कुछ पता नहीं लेकिन
तुम्हारे प्रेम के उजाले से मेरा अस्तित्व जगमगा उठा है
और देखो यह रोशनी हमारे मिलन की
मौन रहकर इस रात को सवेरा बना रही है।







Monday, 2 June 2014

मेरे पिता



मां अतुल्य है जीवन की साक्षी है 
लेकिन पिता बिना मां की परिभाषा कहां बन पाती
मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं
जिसकी छत्रछाया में मां हमें पालती है

मेरे पिता, बचपन में आपकी फटकार के संग
मैंने आपका दिल धड़कते महसूस किया है
पर मां की डांट के बाद आपका प्यार
मन के कोनों में प्रकाश भरता रहा है

आप हैंं तो जीवन सुंदरतम है
आपके होने से ही आंखों में इतने रंग हैं
आपका होना ही मेरा खुद पर विश्वास है
मेरे जीवन के कल्पतरु हैं आप पिता

जीवन के तमाम विषाद पीकर
हर दर्द को अपने सीने में समेटकर 
आपने दी हर मुश्किल को चुनौती
कि आज मेरी सफलताएं आपसे ही हैं

मेरी उपलब्धियों पर मुस्कुराते आप 
मेरी विफलताओं पर अब कुछ नहीं कहते
नहीं, इतना बड़ा तो नहीं होना था मुझे
आप ही मेरे नायक हो, कुछ सवाल तो किया करो

आपका कुनबा बढ़ रहा है लेकिन
इस वटवृक्ष की जड़ें आप ही हो
कि आपकी गोद में सिर रखकर
अब भी वक्त बिताना अच्छा लगता है,

जी चाहता है तोड़ दूं दीवार घड़ी की सुइयां
कि आप बूढ़े नहीं हो सकते कभी
आपकी निरंतरता मेरी रगों में है
मैं दुनिया में आपका ही प्रतिरूप हूं,

आपके होने से ही मैं हूं पिता
आपका कभी न होना कल्पना से भी परे है
इन आंखों में सपने भरने वाले पिता
मैंने आपके बिना दुनिया सोची नहीं अब तक

मेरे मन के जीवट योद्धा
जागो कि तुम ढले नहीं, बस थक गए हो 
मैं हूं तुम्हारी आत्मशक्ति देखो मुझे
तुम्हारी आत्मा का अंश हूं, मुझमें जवान होते पिता




Tuesday, 27 May 2014

बाबा ऐसा वर ढूंढो



मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो
खुद से दूर भेजना चाहते हो
अपने आंगन की लाडली को 
किसी को सौंप देना चाहते हो

मेरे प्यारे बाबा ऐसा वर ढूंढो 
जो मेरा हाथ थामकर चले
सात जन्मों के बंधन नहीं मानती मैं
पर यह जन्म उसका और मेरा साझा हो

मेरे हिस्से की धूप-छांव
साथ खड़े रहकर महसूस करे
पर ऐसे वर से मत मांधना बंधन मेरा
जो किसी के साथ कभी खड़ा ही न हुआ हो

जो अपनी शान और अस्तित्व को
थोपकर मुझे जड़ कर दे
मत देना मेरा हाथ उसके हाथों में 
जो मेरी सरलता को ब्याहकर खरीद ले

जो प्रेम का मतलब न जानता हो
उससे प्रीति का संबंध मत लगाना मेरा
कि कुंद कर दे वो मेरे भीतर की स्त्री का हृदय
कठोरता के लबादे से ढंक दे  कि मैं उस जैसी ‘सभ्य’ दिखूं

मेरी चंचलता को अपमान कह दे जो
मेरी शरारतें जिसके समाज में असभ्य लगें
मत ब्याहना ऐसे महलों में रहने वाले से
जो आपकी परवरिश का उपहास करे

छोटी-छोटी खुशियां बटोर कर
आंचल मैं फैला दूं तो भर दे जो
चांद-सितारों की चाहत नहीं मुझको
ब्याहना उससे जिसकी आंखों में नींद न आए मेरे रो देने पर

वर वही खोजना बाबा
जो मेरा देवता बनने को दबिश न दे
मेरा आधा हिस्सा बनकर जिए मुझमें
कि उसके या मेरे प्रेम पर ‘हमारा’ हक हो

चली जाऊंगी उससे ब्याह करके
जो मुझे मेरे हिस्से के आकाश को चूमने दे
जो बांट ले मेरे जनम भर की रातें-दिन, सुख-दुख
मेरे जीवन के शब्दकोश से मिटा दे अकेलापन
बाबा ऐसा वर ढूंढो।



Monday, 26 May 2014

कुएं का पानी


गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है
तृप्त चेहरे देख, विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी 
अपनी सूखती धमनियों से 
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी 
सींच रहा है सैकड़ों जीवन

कोई अभिलाषा शेष नहीं है
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले
वह निभा रहा है कर्त्तव्य  धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का



Wednesday, 7 May 2014

वह अल्हड सी लड़की



वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है

नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है

चावल से कंकड़ों को बीनती 
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती 
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर

किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती

हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात

सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है

वह हंसती है क्योंकि 
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है

वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया

वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।


Saturday, 3 May 2014

मेरी मां


मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का 
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न 
दुनिया में मेरी शीतल बयार

मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां,
 नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर




बरगद का पेड़


आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष

सूना है, उदास सा अकेला

कल तक जो उसकी गोद में

खेला करते थे, वे बच्चे

आज बड़े हो गये हैं


धूल भरे उलझे बालों की 

चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी

और उसे मारता, दुलारता वो नन्हा 

पर शैतान सा बच्चा 


परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर 

अपने दोस्तों से मिलकर 

फफक उठे थे सारे और फिर

वापस आने का वादा कर गए


उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़

अपनी लटें बिछाए बैठा है पर

उसकी जवानी के दिनों के बच्चे 

जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं


अब उनकी दुनिया 

बहुत बड़ी हो चुकी है

शायद बरगद से भी बड़ी जहां,

खेलकर वे बड़े हुए थे


और जर्जर होता वृक्ष इस आस में

किसी दिन ढह जाएगा कि 

शायद वापस आकर कभी परदेश से

 यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे