Wednesday, 11 June 2014

तुम्हारी रोशनी




दिन भर की थकान के बाद
सूरज जब ढलने लगता है
उसकी सुनहरी रश्मियों से टकराकर बनने वाली
तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

छत की मुंडेर पर खड़ी रहकर अनवरत
उस परछार्इं को जाते हर दिन देखती हूं
जो तुम्हारे लौटने के साथ-साथ
मुझसे दूर होती चली जाती है

हर दिन तुम्हें छूकर आने वाली
इन किरणों को आंखों से स्पर्श करती हूं
जैसे तुम्हारे और मेरे दरमियान
स्रेह का अस्तित्व बस इन्हीं से है

मेरी पहुंच से दूर रहकर भी
तुम मुझे रोज छूकर गुजर जाते हो
और तुम्हारी रोशन छवि निहारकर
मेरा मन प्रकाश से भर जाता है

मेरे छज्जे से तुम्हारे छज्जे के कोने तक
ये दूरी जैसे जनम भर की हो 
पर रोज तुम्हारे ओझल होने से पहले
मन की मखमली कैनवास पर
तुम्हारी तस्वीर उतार लेती हूं

ये फासले कब तक रहें कुछ पता नहीं लेकिन
तुम्हारे प्रेम के उजाले से मेरा अस्तित्व जगमगा उठा है
और देखो यह रोशनी हमारे मिलन की
मौन रहकर इस रात को सवेरा बना रही है।







24 comments:

  1. धन्यवाद् अनुषा।

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  2. धन्यवाद यशवंत जी आपको।

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  3. अनुरक्ति को बहुत सुन्दरता के साथ पेश किया है.

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  4. कल 15/जून/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. आपका आभार यश जी

      सादर।

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  5. जबरदस्त.....क्या बात है!!

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    1. धन्यवाद् संजय जी।

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  6. बहुत अच्छा लिखा है |

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    1. जी धन्यवाद आपको सादर।

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  7. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति स्मिता जी ..

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    1. नीरज जी धन्यवाद् आपको सादर

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  8. वाह बहुत खूब लिखा है आपने ।बधाई।

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    1. सादर आभार नवीन जी

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  9. बढ़िया अभिव्यक्ति ! बधाई

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    1. सादर धन्यवाद आपको।

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  10. बहुत खूबसूरत कविता है

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    1. धन्यवाद शेफाली जी।

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  11. बहुत सुन्दर अनुभूतियाँ हैं आपकी। बहुत बधाईयां व सादर शुभकामनाएं!

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    1. आभार आपका मधुरेश जी

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  12. Sunder paishkah dhero shabdo ke rash me nahayi hui hai aapki kavita....badhaai....

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    1. आभार आपका परी जी

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