Wednesday, 7 May 2014

वह अल्हड सी लड़की



वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है

नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है

चावल से कंकड़ों को बीनती 
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती 
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर

किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती

हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात

सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है

वह हंसती है क्योंकि 
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है

वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया

वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।


16 comments:

  1. Wowwwww Smita. Ye tmne likha hai???? Gr8 job if it is so.:-)

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  2. Wowwwww Smita. Ye tmne likha hai???? Gr8 job if it is so.:-)

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  3. thank u so mauch armaan ji..par kya ap btayege ki ap kaun hai??

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  4. अच्‍छी बन पडी है यह कविता

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    1. धन्यवाद् सर।। छोटा सा प्रयास किया है। जो लिखा उसे शेयर करने की इच्छा थी।।

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  5. थैंक यू दोस्त।

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  6. ye kewar humare bharat ki mahila kar sakte hai jo apne liye na jikar apne pariwar ke liye jeti hai or unke kushi me khush hote hai.
    Bahut Khaab....................

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  7. bilkul sahi kaha radhika...thanks for ur nice comment

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  8. दिल से लिखी ..सुन्दर रचना .....

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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    1. आभार। जी जरुर आपके ब्लॉग को देखेंगे।

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  9. Replies
    1. Ise padh k lag raha hai aane waale dino me hame bhi aise hi sab karna padega is aladh ladki ki tarah. Bahut khooob....:)

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