Saturday, 19 July 2014

देखो कान्हा


सुन लो कान्हा मेरे कान्हा
मैं सखियों संग न जाऊंगी
मैं तुम संग दिन भर डोलूंगी
देखो कान्हा मेरे कान्हा

जब रास रचाई थी तुमने
मैं तन-मन भूल चुकी थी सच
तुम भोले-भाले चंचल से
मोहक चितवन, आमंत्रण से

मुरली मधुर बजा कान्हा
नित लीला नई दिखाते हो
मैं हुई प्रेम में दीवानी
तुम क्यों ना प्रीति लगाते हो

मैं वारी जाऊं तुम पर जो
तुम ज्यादा ही इतराते हो
मैं चोरी कर लूंगी तुमको
मटके में धर लूंगी तुमको

खोलूं मटका देखूं तुमको
इस मटके में रह जाओगे
मेरे कान्हा प्यारे कान्हा
देखो कान्हा, सुन लो कान्हा




29 comments:

  1. सुन्दर पंक्तियाँ कान्हा-स्नेह की.

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    1. धन्यवाद।
      सादर

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  2. बहुत सुंदर एवं भावपूर्ण रचना.

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  3. इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 20/07/2014 को "नव प्रभात" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1680 पर.

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    1. विनम्र आभार राजीव जी

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  4. मनमोहक रचना,,,

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    1. धन्यवाद अरमान जी

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  5. सुन्दर , मनभावन भाव

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  6. जब रास रचाई थी तुमने
    मैं तन-मन भूल चुकी थी सच
    तुम भोले-भाले चंचल से
    मोहक चितवन, आमंत्रण से
    सुन्दर रचना

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    1. धन्यवाद अनुषा जी

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  8. कान्हा तो मन में हैं .. सुनाने की क्या जरूरत वो समझ जाते हैं भावों को ...

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  9. श्याम के रंग में रंगी सुन्दर प्रस्तुति।

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  10. सुंदर और भावमय अभिव्यक्ति...

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  11. गहरे भाव....बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

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    1. आभार संजय जी

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  12. बहुत ही बढ़िया

    सादर

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    1. धन्यवाद यश जी

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  13. bahut hi bhaawpurn aur sunder sbhivyakti ............

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  14. यही शाश्वत प्रेम है।
    जय श्री राधे

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