Wednesday, 23 July 2014

जब हम सब दीवाने थे



वो बचपन का जमाना था
जो दुनिया से बेगाना था
जहां गुड़िया की शादी थी
जहां गुड्डे का गाना था

कभी अंताक्षरी के दिन
कभी चौपाल सजती  थी
गुलाबी दिन हुआ करते
गुलाबी रात लगती थी

जेबों में कुछ आने थे
मगर मेले सुहाने थे
वो बाइस्कोप अच्छे थे 
डंडा गिल्ली पे ताने थे

चवन्नी की बरफ मिलती
अठन्नी की मिठाई थी
वो खुशियों से भरे दिन थे
भले ही कम कमाई थी

ऊदल की वो गाथा थी
जो दादी तब सुनाती थीं
आल्हा के पराक्रम के
नानी गीत गाती थीं

एक टांग के सब खेल
महंगे खेलों से अच्छे थे
इस आलीशान यौवन से
वो बेफिकर दिन ही अच्छे थे

वो दोहे, गीत वो सारे
जो हम बचपन में गाते थे
वो बातें, मस्तियां सारी
जहां गम भूल जाते थे

कोई वापस दिला दे आज
जो बचपन के जमाने थे
जहां हर पल में जादू था
जब हम सब दीवाने थे

54 comments:

  1. बचपन सिर्फ यादों मे है।
    सच मे बहुत याद आते हैं वो बचपन के दिन।


    सादर

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    1. सचमुच वो यादें ही रह गई है शेष
      प्रतिक्रिया के लिए आभार

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    2. bahut sundar bachpan bahut pyara hota hai

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  2. Replies

    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  3. zamaane yaad dila diye aapne bachpan ke... bahut badhiyaan

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  4. बहुत बढ़िया
    वाकई बचपन के दिन सुहाने थे

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    1. सचमुच
      प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  5. बहुत खूब। वाह।

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    1. धन्यवाद् राहुल जी।

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  6. सच.....बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@मुकेश के जन्मदिन पर.

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    1. धन्यवाद्।
      सादर

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  7. वाह, अच्‍छी कविता

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  8. हम सब यही चाहते हैं , मंगलकामनाएं आपको !

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    1. जी हम सब यही चाहते है।
      प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  9. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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    1. तारीफ के लिए शुक्रिया संजय जी।
      सादर

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  10. कल 25/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. विनम्र आभार यश जी

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  11. खूबसूरत...बेहद खूबसूरत!!!!

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    1. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद अभिषेक जी.

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  12. कोई वापस दिला दे आज
    जो बचपन के जमाने थे
    जहां हर पल में जादू था
    जब हम सब दीवाने थे.............वाह !! सजीव चित्रण , बहुत उम्दा

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    1. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद अमित जी

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    1. सादर आभार जोशी जी

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  14. बचपन की यादें ताज़ा कर दीं...बहुत ही सुन्दर रचना...

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    1. प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार

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  15. बचपन आँख झपकते ही फुर्र हो ताजा है ... इसलिए ही उसकी यादें रह जाती हैं हमेशा ताज़ा जैसे कल की ही बात हो ...

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    1. सचमुच
      प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  16. कोई वापस दिला दे आज
    जो बचपन के जमाने थे
    जहां हर पल में जादू था
    जब हम सब दीवाने थे
    .. अब न वो खेल रहे न खेलने वाले ही दीखते हैं .. एक हूक सी उठती है मन में बचपन के खेल देखने फिर से खेलने के लिए ...
    बहुत ही सुन्दर

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  17. वो मस्तियाँ, वो शरारतें... बचपन की बातें, बचपन की यादें
    ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति...बधाई

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  18. बचपन तो उम्र पच्पन हो जाये फिर भी याद रहती है।
    एक यही उम्र ऐसा है, जिसमें इंसान इंसान बना रहता है। बहुत सुन्दर रचना आपकी इस उम्र के संदर्भ में।

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  19. स्मिता जी बूंद-बूंद बदमाशीयों से भरी कितनी सुंदर यादें।
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
    नई रचना : इंसान

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आपकी आभारी हू राहुल जी

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  20. बचपन में तो अरुण, जाहिद और सलिल ईसाई,
    साथ खेला करते थे, सतौलिया और चोर सिपाही,
    ये जो समझदारी हमने ओढ़ रखी है,
    ये समझदारी है या,
    समझदारी ने बना दिया है,
    इंसान को उल्लू ,
    http://jameenpar.blogspot.in/2013/08/blog-post_7.html
    आपकी कविता बालमन से ओतप्रोत है..अतिसुन्दर...
    बचपन, तुम तो ज़रा भी नहीं बदले,
    अभी भी उतने ही उल्लसित और आनंदित हो,
    जितने तब थे, जब में तुम्हारे अन्दर था या,
    तुम मेरे अन्दर थे,

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आपकी आभारी हू

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  21. खिलौनों की बारात
    गुड़ियों की शादी
    तेरा शहजादा
    मेरी शहजादी
    तुम्हें याद हो या न हो याद लेकिन
    मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन

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  22. खिलौनों की बारात
    गुड़ियों की शादी
    तेरा शहजादा
    मेरी शहजादी
    तुम्हें याद हो या न हो याद लेकिन
    मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन

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    1. वाह। क्या बात है झा साहब। बहुत बढ़िया
      आभारी हु

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  23. आह !!
    जब हम सब दीवाने थे! मंगलकामनाएं आपको !

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आपकी आभारी हू

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  24. मन को छूती अभिव्यक्ति
    वाह !!! बहुत सुन्दर रचना ----
    बधाई--

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    1. सादर आभार आपका

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  26. वो बचपन के दिन भी नायाब होते हैं
    जब मां की गोद में सिर रखकर होते हैं,,,
    नायाब रचना स्मिता,,,

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    1. क्या बात है। बहुत खूब अरमान जी।
      प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

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