Sunday, 20 July 2014

मुनिया की मौत





इस गांव की हवेलियों के पीछे
एक चमारों की बस्ती है
रहती हैं जहां मुनिया, राजदेई और जुगुरी
अपनी चहक से मिटाती हैं गरीबी का दंश

ये उन चमारों की बेटियां है
जिनके मजबूत हाथ और बलिष्ठ शरीर
जमींदारों के खेत में हरियाली बोते हैं
लोगों का पेट भरते हैं अन्नदाता हैं हमारे

भयानक ठंड और चिलचिलाती धूप में
ये लोग खेतों में गीत गाते हैं
अनाज के सैकड़ो बोरे पैदा करने के बदले
कई रातें फांका करके सोने को विवश हैं

फिर भी अपने कर्त्तव्य की तपिश में
भूखे पेट भी ठाकुरों की बेगारी करते हैं
उनके लठैतों और लाडलों का
आंखों में खौफ दिन-रात रहता है

पशुओं की चरी और बरसीम सिर पर लिए
हाथ में टांगे कंडियों की टोकरी
एक दिन अपनी धुन में चली आती थी मुनिया
आंखों में बाजरे से हरे सपने लिए

क्या पता था उस बालिका को
कोई भेड़िया है घात में
उसकी कोमलता को शापित करने को
किसी जानवर ने झपट्टा मारा था

दर्द से बिलबिलाती मुनिया की 
तड़पती चीखें दबती गर्इं, थमती गर्इं
उसके विरोध से घायल भेड़िये के पंजों ने
मुनिया से जीने का हक भी छीन लिया

कल तक आंगन में फुदकती मुनिया
नि:शब्द हो गई, गहरी नींद सो गई
बाप की लाडली, मां की प्यारी बेटी
निर्मम दुनिया को अलविदा कह गई 

मुनिया की लाश लिए खड़ा था बाप उसका
ठाकुरों के बेटे बन्दूक लहराते पहुंच आए थे बस्ती में
बोले दफन करो चमारों अपनी औलाद को
इस ‘सभ्य’ गांव में पुलिस नहीं आने पाए

कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए
बाप की आंखें इंतजार में सूखी जा रही थीं
थाने में रपट लिखाए दिन बीत गया लेकिन
कोई ‘कानून का रखवाला’ बस्ती में नहीं पहुंचा

पता चला कि ‘हवेली’ में आज 
शराब का दौर ‘साहब’ लोगों के लिए चल रहा है
इधर चमारों की पूरी बस्ती में
एक भी चूल्हा नहीं जल रहा है

तब उस मजबूर बाप ने अपनी मुनिया को
ढेलों के बीच एक गड्ढे में दफना दिया
और ठाकुरों के अय्याश लाडलों की
पंचायत में पेशी को चल दिया।





41 comments:

  1. बहुत ही संवेदनशील रचना ... मार्मिक चित्रण है कडुवे सच का ...

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  2. क्या बात है,,,अद्भुत

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    1. धन्यवाद अरमान जी

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    1. धन्यवाद आशीष जी

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  4. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना मनमंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 21 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  5. मार्मिक भावाभिव्यिकि्त।।।
    कटु सत्य को बयां करती रचना।।।

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    1. शुक्रिया अनुषा

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ४५ साल का हुआ वो 'छोटा' सा 'बड़ा' कदम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. बहुत ही दयनीय, समाज को दर्पण दिखाती रचना |
    कर्मफल |

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  8. समाज की विद्रूपता को दिखाती रचना.

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    1. आपका आभार
      सादर

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  9. मार्मिक..संवेदनशील रचना !

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  10. दुखद सत्य है. कब होगा ख़त्म यह!

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    1. सत्य कह रहे हैं आप. जाने कब हम हर किसी को इंसान समझ पाएंगे
      आभार

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  11. आज तो सच को एकदम सटीक शब्द दे दिए आपने. एक एक पंक्ति बोलती सी.
    बहुत ही पसंद आई ये रचना.

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार संजय जी

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  12. This comment has been removed by the author.

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  14. हमारे आस-पास की हर 'मुनिया' की मौत के लिए हम सभी बराबर से जिम्मेदार हैं।


    सादर

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    1. satya kah rhe hain aapn yash ji
      thank u

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  15. urf sach me dil ko chuti hui rachna...katu satya Smita ...

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  16. कटु सत्य को शब्दों में बहुत अच्छा उकेरा है। पिताना जाने कितनी मुनियायें विवश हैं और उनसे बी ज्यादा विवश उनके माता पिता.

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    1. सत्य कहा आपने घोर विवशता है
      सादर आभार आशा जी

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  17. बेहतरीन मार्मिकता से परिपूर्ण विषय को रचना के माध्यम से उखेरा है।
    सुन्दर बहुत सुन्दर रचना।

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  18. Replies
    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  19. मुनिया की विवशता को शायद यह समाज समझ सके …
    कई प्रश्न उठाती सार्थक रचना !

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार

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  20. सुंदर
    बहुत ही मार्मिक...
    कृपया blog पर आयें.. http://thesrjblogs.blogspot.in/2014/10/blog-post_3.html?m=1

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  21. बहुत ही मार्मिक लेख लिखा आपने.... समाज की स्थिति ब्याँ कर दी।

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